पश्चिमी एशिया में चल रहा भीषण युद्ध अब एक अत्यंत निर्णायक और खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच संघर्ष की तीव्रता इतनी बढ़ गई है कि अब सीधे क्रूड ऑयल और गैस के भंडारों पर हमले शुरू हो गए हैं। बुधवार को ईरान के विश्व के सबसे बड़े गैस फील्ड 'साउथ पार्स' पर हुए हमले के बाद एक नया विवाद खड़ा हो गया है।
इजरायल ने दावा किया है कि यह हमला उन्होंने अमेरिका के साथ मिलकर किया है, लेकिन दूसरी तरफ अमेरिका ने इस हमले में अपनी किसी भी संलिप्तता से साफ इनकार कर दिया है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक यह हमला सिर्फ इजरायल ने ही किया है। ये परस्पर विरोधी बयान अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ती दरार की ओर इशारा कर रहे हैं।
ईरान के खिलाफ ट्रंप की गणनाएं उलटी पड़ीं
युद्ध के मैदान में अमेरिका बुरी तरह फंस गया है। डोनाल्ड ट्रंप को उम्मीद थी कि ईरान कुछ ही दिनों में आत्मसमर्पण कर देगा और सत्ता परिवर्तन होगा, लेकिन ईरान ने दृढ़ता से पलटवार करते हुए अमेरिका की गणनाओं को उलटा कर दिया है। ईरान ने अमेरिकी डिफेंस सिस्टम को भारी नुकसान पहुंचाया है और बदले में कतर तथा सऊदी अरब की गैस और तेल फैसिलिटीज पर भी ड्रोन हमले किए हैं।
इस स्थिति में अब डोनाल्ड ट्रंप इस महंगे और जोखिम भरे युद्ध से बाहर निकलने का बहाना ढूंढ रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप अब दुविधा में हैं कि युद्ध जारी रखें या जीत की घोषणा करके पीछे हट जाएं।
यह भी पढ़ें: चीन-पाकिस्तान बना रहे हैं खतरनाक मिसाइल: US रिपोर्ट में दावा, पहलगाम का भी उल्लेख
सत्ता परिवर्तन के अमेरिकी मंसूबों पर फिरा पानी
वैश्विक स्तर पर भी अमेरिका अब अलग-थलग पड़ रहा है। नाटो देशों और यूरोप ने इस जंग को सिर्फ 'अमेरिका का युद्ध' बताकर साथ देने से इनकार कर दिया है। दूसरी तरफ, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने और गैस फील्ड्स पर हमले के कारण पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट गहरा गया है, जिससे खाड़ी देशों में भी भारी चिंता फैल गई है। ईरान न तो झुक रहा है और न ही वहां सत्ता परिवर्तन हो रहा है, उल्टा अमेरिका के लिए यह युद्ध अब गले की हड्डी बन गया है।