```json
{
"title": "पेट्रोल-डीजल के दाम क्यों नहीं घट रहे? सरकार ने चुकाया ₹2.92 लाख करोड़ का तेल बॉन्ड का कर्ज, फिर भी हाल बेहाल!",
"content": "कल्पना कीजिए कि आपने सालों पहले घर खरीदने के लिए लोन लिया था और आज उसका आखिरी हफ्ता चुका दिया है। स्वाभाविक है कि आपके सिर से कर्ज उतर जाने से आपकी मासिक आय में से थोड़ी बचत होने लगे। भारत में पेट्रोल और डीजल के भाव के संदर्भ में भी फिलहाल ऐसी ही चर्चा चल रही है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी बार-बार ऐसी दलील देते हैं कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली पूर्व यूपीए सरकार द्वारा खड़े किए गए 'तेल बॉन्ड' के कारण सरकारी खजाने पर भारी बोझ था, जिसके चलते पेट्रोल-डीजल के भाव घटाए नहीं जा सकते थे। अब वित्त मंत्री ने आधिकारिक रूप से घोषणा की है कि यह कर्ज मार्च 2026 तक पूरी तरह से चुका दिया गया है। इस स्थिति में आम जनता के मन में एक ही सवाल है, अगर कर्ज उतर गया तो क्या अब पेट्रोल और डीजल के भाव घटेंगे? चलिए, इस पूरे मुद्दे को विस्तार से समझते हैं।\nयूपीए सरकार का विरासत, ‘तेल बॉन्ड’ क्या है?\n'तेल बॉन्ड' एक प्रकार का वित्तीय साधन था, जो तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा 2005 से 2010 के बीच जारी किए गए थे। उस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल के भाव $100 प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गए थे। लोगों को महंगाई से राहत देने के लिए यूपीए सरकार इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी तेल कंपनियों को नकद सब्सिडी देती थी। लेकिन वित्तीय तंगी के कारण यूपीए सरकार ने तेल कंपनियों को नकद के बदले तेल बॉन्ड दिए। सरल भाषा में कहें तो सरकार ने भविष्य में चुकाने के वादे के साथ IOU (I Owe You) नोट दिया। इस बॉन्ड पर 7% से 8.4% का ब्याज दर तय किया गया था। महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस बॉन्ड को सरकारी बजट के बाहर रखा गया था, ताकि वित्तीय घाटा कम दिखे।\nकुल कितने तेल बॉन्ड जारी किए गए थे?\nवित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्यसभा में दिए अपने बयान के अनुसार 2004-05 से 2009-10 के दौरान यूपीए सरकार द्वारा कुल ₹1.48 लाख करोड़ के तेल बॉन्ड जारी किए गए थे। इस बॉन्ड पर चुकाए गए ब्याज की कुल रकम 2007-08 से अब तक लगभग ₹1.44 लाख करोड़ होती है। यानी कि, मूल कर्ज और उसके ब्याज सहित कुल बोझ लगभग ₹2.92 लाख करोड़ का हुआ था।\nNDA सरकार ने 12 सालों में ₹2.92 लाख करोड़ चुकाए\nवित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मार्च 2026 की शुरुआत में घोषणा की थी कि, हमारी सरकार ने यूपीए युग के इस तेल बॉन्ड का संपूर्ण कर्ज (मूलधन+ब्याज) चुका दिया है। राज्यसभा में एक चर्चा के दौरान उन्होंने बताया था कि, ‘कल्पना कीजिए, अगर यह रकम भूतकाल के कर्जों की भुगतान में न खर्च हुई होती, तो इसका उपयोग भारत के भविष्य के निर्माण में हो सकता था। बंदरगाहों, सड़कों, अस्पतालों और स्कूलों के निर्माण के लिए ये पैसे इस्तेमाल किए जा सकते थे। ऐसा कर्ज खत्म करना महंगा होता है, लेकिन यह जरूरी था।’ इस बयान से स्पष्ट होता है कि सरकार ने इस कर्ज को अपने लिए बड़ा बोझ बताया था।\nपेट्रोल-डीजल के ऊंचे भाव के लिए, तेल बॉन्ड ही एकमात्र कारण?\nअब प्रश्न यह है कि क्या इतने सालों तक पेट्रोल-डीजल के ऊंचे भाव के लिए सिर्फ इस ₹2.92 लाख करोड़ के कर्ज को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? कुछ आंकड़ों पर नजर डालते हैं।\nसरकार की कमाई: वित्त मंत्री के अनुसार यह कर्ज ₹2.92 लाख करोड़ का था। लेकिन सरकार ने 2014 से 2023 के बीच पेट्रोल और डीजल पर वसूले जाने वाली एक्साइज ड्यूटी से कितनी कमाई की थी? विभिन्न रिपोर्ट्स और संसद में दिए जवाबों के मुताबिक इस समयावधि में सरकार ने इस ड्यूटी से लगभग ₹20 से ₹25 लाख करोड़ की आय प्राप्त की थी।\nएक्साइज ड्यूटी में हुआ भारी इज़ाफ़ा: 2014 में पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी ₹9.48 प्रति लीटर थी, जो मई 2020 में बढ़कर ₹32.98 प्रति लीटर के शिखर पर पहुंच गई थी। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के डेटा के अनुसार 2020-21 में एक्साइज ड्यूटी कलेक्शन ₹3.84 लाख करोड़ के उच्चतम स्तर पर था, जो पिछले वर्ष के मुकाबले लगभग 67% अधिक था।\nइन दो आंकड़ों की तुलना से स्पष्ट होता है कि सरकार ने तेल बॉन्ड के कर्ज से कई गुना ज्यादा कमाई सिर्फ एक्साइज ड्यूटी से ही की थी। इसलिए सवाल है कि क्या कर्ज का बोझ ही वास्तव में भाव घटा न पाने का मुख्य कारण था या फिर यह एक बहाना था?\nपेट्रोल-डीजल के भाव को असर करने वाले अन्य कारक\n1. अंतरराष्ट्रीय क्रूड ऑयल के भाव: यह सबसे बड़ा कारक है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% क्रूड ऑयल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय भाव में होने वाला बदलाव सीधा असर करता है। फिलहाल युद्ध के कारण भाव ऊंचे हैं।\n2. डॉलर के सामने रुपये का भाव: अंतरराष्ट्रीय व्यवहार डॉलर में होने के कारण रुपया कमजोर पड़ने पर आयात महंगा पड़ता है।\n3. केंद्रीय और राज्य कर: पेट्रोल-डीजल की कीमत में सबसे बड़ा हिस्सा कर का होता है। केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी वसूलती है, जो फिलहाल पेट्रोल पर लगभग ₹21.90 प्रति लीटर और डीजल पर ₹17.80 प्रति लीटर है। इसके अलावा, राज्य सरकारें अपनी-अपनी 'वैट' वसूलती हैं, जिसके कारण हर राज्य में भाव अलग होते हैं।\nयुद्ध के हालातों में क्या क्रूड ऑयल के भाव घटेंगे?\nअब कर्ज चुका दिया गया है, लेकिन मौजूदा समय में पेट्रोल और डीजल के भाव को प्रभावित करने वाले कई अन्य कारक सक्रिय हैं, जिसके कारण तत्काल राहत की उम्मीद कम दिखती है।\n1. भू-राजनीतिक तनाव और क्रूड ऑयल के भाव: फिलहाल मध्य-पूर्व एशिया में इजरायल-ईरान युद्ध के कारण स्थिति बेहद तनावपूर्ण है। ईरान ने होर्मुज की खाड़ी से गुजरने वाले ऊर्जा उत्पादों को सीमित कर दिया है, जिसके कारण पूरी दुनिया में क्रूड ऑयल के भाव में भारी उछाल देखने को मिल रहा है। 19 मार्च, 2026 को ब्रेंट क्रूड का भाव बढ़कर $112 प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया था।\n2. होर्मुज की खाड़ी का महत्व: भारत अपनी क्रूड ऑयल की लगभग 85% और एलपीजी की 65% जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है, जिसमें से 90% एलपीजी होर्मुज की खाड़ी से गुजरता है। इस मार्ग पर अनिश्चितता सीधे तौर पर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और भावों को प्रभावित करती है।\n3. सरकार की तैयारी: संभावित संकट को ध्यान में रखते हुए सरकार ने सक्रिय कदम उठाए हैं। वित्त मंत्री के मुताबिक, देश में एलपीजी का उत्पादन 25% बढ़ाया गया है, ताकि घरेलू गैस सिलेंडर की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। सरकार के पास करों में कटौती करके भाव को नियंत्रण में रखने का विकल्प भी है, लेकिन इसकी सीमाएं हैं।\nतो क्या भाव घटने की संभावना न के बराबर है?\nतेल बॉन्ड का ऐतिहासिक बोझ अब नहीं रहा, लेकिन मौजूदा भू-राजनीतिक संकट और उसके कारण आसमान छू रहे क्रूड ऑयल के भाव को देखते हुए कम समय में पेट्रोल-डीजल के भाव में गिरावट आने की कोई संभावना नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक क्रूड का भाव $70-75 प्रति बैरल तक नीचे जाता है तभी सरकार कर में कटौती करने की सोच सकती है। मौजूदा परिस्थितियों में आने वाले समय में भी भाव स्थिर रहने या बढ़ने की ही संभावना अधिक है, इसलिए आम जनता को पेट्रोल-डीजल के भाव में गिरावट के लिए अभी इंतजार करना होगा।",
"summary": "सरकार ने यूपीए सरकार के समय के तेल बॉन्ड का कर्ज चुका दिया है, लेकिन पेट्रोल-डीजल के दाम अभी भी कम नहीं हो रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय क्रूड ऑयल के ऊंचे दाम और भू-राजनीतिक तनाव के कारण निकट भविष्य में कीमतों में कमी की संभावना कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक क्रूड ऑयल की कीमतें $70-75 प्रति बैरल तक नहीं गिरतीं, तब तक सरकार टैक्स में कटौती नहीं करेगी।",
"seo_title": "पेट्रोल-डीजल के दाम क्यों नहीं घट रहे? | VoNetvNews",
"seo_description": "जानें, सरकार ने तेल बॉन्ड का कर्ज चुका दिया
पेट्रोल-डीजल के दाम क्यों नहीं घट रहे? सरकार ने चुकाया ₹2.92 लाख करोड़ का तेल बॉन्ड का कर्ज, फिर भी हाल बेहाल!